शेर-ओ-शायरी

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कुछ निगाहों से पिला साकी,
हमको नश्शा-ए-पाईदार चाहिए।

-गोपाल मित्तल

1. नश्शा-ए-पाईदार – देर तक रहने वाला


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कैफियते-चश्म उसकी मुझे याद है 'सौदा',
सागर को मेरे हाथ से लीजे कि मैं चला।

-सौदा

1. कैफियते-चश्म - आँखों का नशा, आँखों की दशा 2.सागर - पियाला


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कोई मेरे दिल से पूछे, तेरे तीरे-नीमकश को,
ये खलिश कहाँ से होती, जो जिगर के पार होता।

-मिर्जा 'गालिब'

1.तीरे-नीमकश - वह तीर जो घाव में आधा खींचकर छोड़ दिया गया हो 2. खलिश - पीड़ा, दर्द

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खिलना कम, कम कली ने सीखा है,
तेरी आंखों की नीमबाजी से।

-मीरतकी मीर

1.नीमबाजी - आँख का आधा खुला हुआ होना यानी उनका नशीलापन

 

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