शेर-ओ-शायरी

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बिजली की ताक झाँक से तंग आ गई है जान,
ऐसा न हो कि फूँक दूँ खुद आशियाँ को मैं।

-जलील मानिकपुरी
 

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माना कि फिक्रे- बर्को - गमे – बागबाँ नहीं,
फिर भी कफस, कफस ही तो है आशियाँ नहीं।


1.बागबाँ -बिजली की चिंता और माली का डर 2.कफस -पिंजड़ा

 

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मुद्दतों से मेरे गुलशन का यही अहवाल है,
बिजलियाँ गिरती रहीं और आशियाँ बनते रहे।


1. अहवाल - हाल 2. आशियाँ - घोसला, नीड
 

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मुमकिन नहीं चमन में दोनों की जिद हो पुरी,
या बिजलियाँ रहेगीं या आशियाँ रहेगा।

 

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