शेर-ओ-शायरी

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इधर-उधर, यहाँ-वहाँ हैं बिजलियाँ ही बिजलियाँ,
चमन-चमन कहाँ फिरूँ मैं आशियाँ लिये हुए।

 

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इन्तिजारे-फस्ले-गुल में खो चुके आंखों के नूर
और बहारे-बाग लेती ही नहीं आने का नाम।


1.फस्ले-गुल - बहार का मौसम, वसन्त ऋतु

 

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इन्सान की बदबख्ती अन्दाज से बाहर है,
कमबख्त खुदा होकर भी बंदा नजर आता है।


1.बदबख्ती - बदनसीबी, बदकिस्मती 2.कमबख्त - अभागा, भाग्य का मारा, बदकिस्मत

 

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इसी दिल की किस्मत में तन्हाइयाँ थी,
कभी जिसने अपना - पराया न जाना।
-फिराक गोरखपुरी
 

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