शेर-ओ-शायरी

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देखने के हैं सब, ये दुनिया के मेले,
मरी बज्म में हम रहे हैं अकेले।

 

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नहीं मिलते तो इक अदना शिकायत है न मिलने की,
मगर मिलकर, न मिलने की शिकायत और होती है।
-सीमाब अकबराबादी
 

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फलक के तारों से क्या दूर होगी जुल्मते-शब,
जब अपने घर के चरागों से रौशनी न मिली।
-आनन्द नारायण मुल्ला


1.फलक - आकाश, अंबर, आस्मान 2. जुल्मत - अंधियारा, अंधेरा, अंधकार 3. शब - रात

 

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बेगानावार ऐसे वो गुजरे करीब से,
जैसे कि उनको मुझसे कोई वास्ता न था।
-अजहर कादिरी


1.बेगानावार - बेगानों की तरह
 

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भरी दुनिया में कोई भी नजर नहीं आता अपना,
'अदीब' इक दौर ऐसा
भी   गुजर जाता है इंसा पर।
- अदीब मालीगाँवी

 

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