शेर-ओ-शायरी

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मौत फिर जीस्त न बन जाये, यह डर है'गालिब',
वह मेरी कब्र पर अंगुश्त -– बदंदाँ होंगे।

-मिर्जा गालिब

1.जीस्त - जिन्दगी, जीवन 2.अंगुश्त – बदंदाँ - जो अचंभे के कारण दाँतों में उँगली दबाकर रह गया हो, निस्तब्ध,
चकित (अर्थात् मेरी मृत्यु पर उन्हें अफसोस

होगा और वह मेरी कब्र पर आयेंगे।
मुझे डर है कि उसके आने से मृत्यु जीवन

न बन जाए और उन्हें मुंह में उँगली देनी पड़े)

 

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यह तो नहीं कहता कि इन्साफ ही करो,
झूठी भी तसल्ली हो तो जीता ही रहूँगा।

-सौदा

 

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वक्ते-पीरी दोस्तों की बेरूखी का क्या गिला,
बच के चलता है हर इक गिरती हुई दीवार से।


1.वक्ते-पीरी - बुढ़ापे के समय

 

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