शेर-ओ-शायरी

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कहाँ तक जफा हुस्न वालों के सहते,
जवानी जो रहती तो फिर हम न रहते।
-'साकिब' लखनवी

 

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कहूँ किससे मैं कि क्या है शबे-गम बुरी बला है,
मुझे क्या बुरा था मरना, अगर एक बार होता।
ये न थी हमारी किस्मत कि विसाले-यार होता,
अगर  और जीते रहते,  यही  इन्तिजार होता।
तेरे वादे पै जिये हम तो ये जान झूठ जाना,
कि खुशी से मर न जाते अगर एतबार होता।
-मिर्जा गालिब


1.शबे-गम - विरह की रात 2.विसाल - मिलन, वस्ल

 

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काट दी उम्र परस्तारिए-गुलशन में 'फिराक',
पर न हुआ फिर भी एक भी गुलेतर अपना।
-'फिराक' गोरखपुरी

1. परस्तारी - पूजा, आराधना, इबादत 2. गुलेतर - एक फूल 

  

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काम आ सकी न अपनी वफायें तो क्या
करें,
इक बेवफा को भूल न जायें तो क्या करें।
इक दिन की बात हो तो उसे भूल जायें हम,
नाजिल हों दिल पै रोज बलायें तो क्या करें।
-'अख्तर' शीरानी

1.नाजिल - गिरना, ऊपर से नीचे आने वाला

2. बलायें - विपत्तियाँ, मुसीबतें

 

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