शेर-ओ-शायरी

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तेरे कूचे में सब पर फूल बरसे,
मगर हम एक पत्थर
को भी तरसे।

 

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थीं जो कल तक कश्ती-ए-उम्मीद को थामी
हुईं,
रूख बदलकर, आज वह मौजें भी तूफां हो गईं।
-'शफक' टौंकी


1. कश्ती-ए-उम्मीद - उम्मीद की नौका

 

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दफअतन तर्के-मुहब्बत में भी रूसवाई है,
उलझे हुए दामन को छुड़ाते नहीं झटका देकर।

-आर्जू लखनवी


1.दफअतन - सहसा, अकस्मात 2.तर्के-मुहब्बत - मुहब्बत का त्याग
 

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दर्द मन्नतकशे-दवा न हुआ,
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ।
जम्अ करते हो क्यों रकीबों को,
इक तमाशा हुआ, गिला न हुआ।

-मिर्जा 'गालिब'


1.मन्नतकशे-दवा - दवा के लिए प्रार्थना या मिन्नत करना

 2.रकीब – किसी स्त्री से प्रेम करने वाले दो व्यक्ति परस्पर रकीब होते हैं

 

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