शेर-ओ-शायरी

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न क्यों भर आयें आंखें, जब मेरे मैखाने में साकी,
छलकता जाम गैरों को मेरी नजरें बचाकर दे।

 

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न हुए तेरी खाके-पा हम, खाक में आपको मिला देखा,
अब न दीजे 'जफर' किसी को दिल, जिसे देखा, बेवफा देखा।

-बहादुरशाह 'जफर'


1.खाके-पा - पांव की धूल

 

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नजर फिर दुश्मनों को ढूँढ़ती है,
जफा-ए-दोस्त है और मैं हूँ।
-जगन्नाथ 'आजाद'


1.जफा-ए-दोस्त - दोस्त का अत्याचार

 

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नहीं मालूम किस-किस का लहू पानी हुआ होगा,
कयामत है सरश्क-आलूदा होना तेरी मिज्गाँ का।
-मिर्जा 'गालिब'


1. सरश्क-आलूदा - आंसुओं से लिप्त या भीगी हुई 2. मिज्गाँ - आँख

 

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