शेर-ओ-शायरी

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वफा कैसी, कहाँ का इश्क जब सर फोड़ना ठहरा,
तो फिर ऐ संगे-दिल तेरा ही संगे-आस्तां क्यों
हो
-मिर्जा गालिब


1. संगे-दिल - पत्थर दिल 2.आस्तां - देहलीज

 

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वह बड़े खुशनसीब इन्साँ है,
जिनकी कश्ती को नाखुदा न मिला।

-अब्दुल हमीद 'अदम'


1. नाखुदा - नविक, मल्लाह

 

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वह आये पशेमाँ लाश पर अब,
तुझे ऐ जिन्दगी लाऊँ कहाँ से मैं?

-मोमिन


1.पशेमाँ
- लज्जित, शर्मिंदा, पछताने वाला, पश्चाताप करते हुए
 

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