शेर-ओ-शायरी

  चराग़ (Lamp)

हमने इक शाम चरागों से सजा रखी है,
शर्त लोगों ने हवाओं से लगा रखी है।

 

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जो रौशनी में खड़े हैं उन्हें मालूम नहीं,
हवा चले तो चरागों की जिन्दगी क्या है।


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न थे चराग तो इक चाँदनी सी फैली थी,
जले चराग तो अब घर में रौशनी कम है।

-सहबा इटावी

 

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चरागों को आंखों में महफूज रखना,
बड़ी दूर तक रात ही रात होगी।
मुसाफिर हो तुम भी, मुसाफिर हैं हम भी
किसी मोड़ पर, फिर मुलाकात होगी

बशीर बद्र

 

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इन्सान ने महरोमाह की राहें तो देखली,
खुद उसकी अंजुमन में चरागाँ न हो सका।


1.महरोमाह – सूरज-चांद- 2.अंजुमन - महफिल 3.चरागाँ - जलते हुए चरागों की कतारें,, रोशनी, प्रकाश

 

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