शेर-ओ-शायरी

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फकत एहसासे-आजादी ही से आजादी इबारत है,
वही घर की दीवार है, वही दीवार,
ज़िन्दां
  की
-सीमाब अकबराबादी


1. इबारत- कायम 2.
ज़िन्दां - कारागार, जेल

 

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फूल चुनना भी अबस, सैरे-बहारां भी अबस,
दिल का दामन ही जो कांटों से बचाया न गया।
-मुईन अहसन 'जज्बी'


1.अबस - व्यर्थ

 

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भले ही कोई ताजमहल न बनवा सके,
मुमताज तो हर दिल में बसा करती है।
 

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मुझे दिल दिया तो तड़प भी दे,
जो हो दूसरों का शरीके-गम।
मुझे
ऐसे
  दिल की तलब नहीं,
जो किसी के काम न आ सके।


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