शेर-ओ-शायरी

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इसी दुनिया की अक्सर तल्खियों ने  मुझको समझाया,
कि हिम्मत हो तो फिर है जहर भी इक चीज खाने की।

-'नैयर' अकबराबादी

 

1. तल्खी  कटुता, कड़वाहट, अरूचिकर बातें

 

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इसी पै नाज घड़ी-दो-घड़ी जली होगी,
इसी पै शम्अ हमारी बराबरी होगी।

-'सफी' लखनवी


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उन्हीं को हम जहाँ में रहरवे-कामिल समझते हैं,
जो हस्ती को सफर और कब्र को मंजिल समझते हैं।
-बर्क
 

1. रहरव - पथिक, बटोही, मुसाफिर 2. कामिल - (i) निपुण, दक्ष, होशियार, चमत्कारी (ii) समूचा, सम्पूर्ण (iii) बिल्कुल, मुकम्मल, सर्वांगपूर्
 

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उन्हें सआदते-मंजिलरसी नसीब क्या होगी,
वह पाँव जो राहे-तलब में डगमगा न सके।
-जिगर मुरादाबादी


1. सआदत - प्रताप, तेज, इकबाल 2. मंजिलरसी - मंजिल
की प्राप्ति, मंजिल तक पहुंच
3. राहे-तलब - रास्ते की खोज

 

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