शेर-ओ-शायरी

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ऐ निगहे-दिलफरेब क्या यह सितम कर दिया,
हौसले जब बढ़ गये, रब्त को कम कर दिया।
-'आर्जू' लखनवी


1. रब्त - लगाव, चाहत

 

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ऐसे कहाँ नसीब शबे - माहताब में,
वह आये और आके न जायें तमाम रात।
-शमीम जयपुरी

1.शबे -माहताब - चाँदनी रात

 

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और तड़पाता है उनका यह सवाल,
क्या तुम्ही हो मुब्तिला-ए-दर्दे-दिल।
-दिल' शाहजहाँपुरी

1.मुब्तिला-ए-दर्दे-दिल - दिल के दर्द से पीड़ित, मुहब्बत के दर्द से ग्रस्त

 

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कई बिजलियाँ बेगिरे गिर पड़ी हैं,
उन आंखों को अब आ गया मुस्कराना।

-'फिराक' गोरखपुरी

 

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