शेर-ओ-शायरी

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किसी की निखरती जवानी का मंजर में,
निगाहें मेरी किस तरह भूल जायें।
वह साड़ी से रंगीं बदन का झलकना,
तहे - आब जैसे दिया झिलमिलाये।
-महेश चन्द 'नक्श'

1. तहे - आब - पानी के नीचे

 

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कहूँ जो हाल तो कहते हो मुद्दआ कहिए,
तुम्हीं कहो कि जब तुम यूँ कहो तो क्या कहिए।

-मिर्जा 'गालिब'
 

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कुछ तुम्हारी निगाह काफिर थी,
कुछ मुझे भी खराब होना था।
-मजाज लखनवी

 

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