शेर-ओ-शायरी

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चोट देकर आजमाते हैं दिले-आशिक का सब्र,
काम शीशे से नहीं लेता कोई फौलाद का।

-सालिक लखनवी
 

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चौदहवीं के चाँद को देख जरा मेरी कसम,
हू-ब-हू गोया तुम्हारे नाज की तस्वीर है।

-सफी औरंगाबादी

 

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छनता है नूर आरिजे- गुलगूं से इस कदर,
हो जाती है सफेद भी उनकी निकाब सुर्ख।
-अमीर मीनाई


1.नूर - नूर, आभा, रौशनी 2.आरिजे- गुलगूं- गुलाबी गाल
3. निकाब - मुखावरण, मुखपट, बुर्का, ओट, पर्दा

4. सुर्ख - लाल रंग, लाल रँगा हुआ
 

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छलकता भी रहे हमदम, रहे लबरेज भी साकी,
तेरी आंखों के सद्के हमने वो भी जाम देखे हैं।
-हजीं


1.लबरेज - ऊपर तक मरा हुआ, परिपूर्ण, लबालब

 

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