शेर-ओ-शायरी

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जिस्म की ऐसी सजावट, रंग का ऐसा निखार,
सर-ब-सर सांचे में गोया ढल गई रूहे-बहार।
-'फिराक' गोरखपुरी

 

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जीना भी आ गया, मुझे मरना भी आ गया,
पहचानने लगा हूँ, तुम्हारी नजर को मैं।

-असगर गौण्डवी

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जुल्फें बिखरी हुई हैं आरिज पर,
बदलियों में चराग जलता है।

-'असर' लखनवी


1.आरिज - गाल, कपोल

 

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जोर से बाज आये पर बाज आये क्या?
कहते हैं हम तुमको मुंह दिखलाये क्या?
-मिर्जा गालिब


1.जोर - जुल्म, अत्याचार

 

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