शेर-ओ-शायरी

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तुम्हें दानिस्ता महफिल में जो देखा हूँ तो मुजरिम हूँ,
नजर आखिर नजर है, बेइरादा उठ गई होगी।


1.दानिस्ता - जान-बूझकर


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तेरा ये तीरे-नीमकश दिल के लिए अजाब है,
या इसे दिल से खींच ले या दिल के पार कर।


1.तीरे-नीमकश - धनुष को आधा खींचकर चलाया हुआ तीर, जो आधा अंदर हो और आधा बाहर हो, कम खींचकर चलाए हुए धनुष का तीर, जो शरीर में पार न हो सके। 2. अजाब - यातना, पीड़ा, दुख, तकलीफ


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तेरी निगाह से ऐसी शराब पी मैंने
फिर न होश का दावा किया कभी भी मैंने
वो और होंगे जिन्हें मौत आ गई होगी
निगाहे - यार से पाई है जिन्दगी मैंने।

 

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तेरी अदायें दिल को लुभायें तो क्या करें,
आंखें न मानें देख ही जायें तो कया करें।
-'असर' लखनवी

 

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