शेर-ओ-शायरी

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नकाबे-रूख उलटने तक तो मुझको होश था लेकिन,
भरी महफिल में उसके बाद क्या गुजरी खुदा जाने।

-सईद अहमद खां


1. नकाबे-रूख - मुखावरण ,मुखपट

 

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नजर जिसकी तरफ करके निगाहें फेर लेते हो,
कयामत तक उस दिल की परेशानी नहीं जाती।
-आनन्द नारायण 'मुल्ला'
 

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नजर में ढलके उभरते हैं दिल के अफसाने
ये और बात है कि दुनिया नजर न पहचाने
यह बज्म देखी है मेरी निगाह ने कि जहाँ
बगैर शम्अ भी जलते रहते हैं परवाने।
-सूफी तबस्सुम (सूफी गुलाम मुस्तफा)

 

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नसीमे-सुबह बू-ए-गुल से क्या इतराती फिरती है,
जरा सूंघे शमीमे-जुल्फ खुश्बू इसको कहते हैं।

-'अनवर' इलाहाबादी


1.नसीमे-सुबह - सुबह चलने वाली ठंडी और धीमी हवा

2. शमीम - सुगन्ध, खुश्बू, महक
 

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