शेर-ओ-शायरी

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आप पहलू में बैठे हैं तो संभलकर बैठें,

दिले-बेताब को आदत है मचल जाने की।
-'जलील' मानिकपुरी


1.पहलू - पार्श्व, बगल

 

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आया है जिक्र अगर दारो - रसन का,
गैसू-व-कदे-यार की बात आ ही गई है।
जब सूर्खिए-गुलशन का कभी जिक्र हुआ है
तेरे लबो-रूखसार की बात आ ही गई है
ढूँढ़ा है अगर जख्मे - तमन्ना न मुदावा
इक नर्गिसे-बीमार की बात आ ही गई है
छेड़ा है कोई तल्ख फसाना हो किसी ने
शीरीनिए-गुफ्तार की बात आही गई है।

-मज्हर इमाम


1.दारो – रसन - फांसी का फंदा 2.गैसू-व-कदे-यार - माशूक का डील-डौल और बाल 3.सूर्खिए-गुलशन - गुलशन की लालिमा या लाली (यानी खूबशूरती) 4. लबो-रूखसार - ओष्ठ और गाल 5.जख्मे–तमन्ना - तमन्ना पूरा न होने का जख्म 6.मुदावा - इलाज, दवा 7.नर्गिसे-बीमार - चश्मे-बीमार, अधखुली आँख विशेषतः प्रेमिका की आँख के लिए बोलते हैं। 8.तल्ख - कड़वा, कटु, अरूचिकर 9.शीरीनिए-गुफ्तार - बात-चीत की मिठास

 

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इक जहाँ है जिसका मुश्ताके-जमाल,
सख्त हैरत है, वह क्यों रूपोश है।

-हसरत मोहानी

1.मुश्ताक - ख्वाहिशमंद 2.जमाल - (i) सौन्दर्य, सुन्दरता, खूबसूरती (ii) मुखकान्ति (iii) शोभा, छटा, छवि 3. रूपोश - (i) जो मुंह छुपाये हो (ii) जो भागा हुआ हो, मफ्रूर

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इक न इक जुल्मत से जब वाबस्ता रहना है तो जोश,
जिन्दगी पर साया-ए-जुल्फे-परीशां क्यों न हो।

-'जोश' मलीहाबादी


1.जुल्मत - अंधेरा, अंधियारा 2.वाबस्ता - जुड़ा हुआ

3. साया-ए-जुल्फे-परीशां - बिखरी हुई जुल्फों का साया

 

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