शेर-ओ-शायरी

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इलाही क्या कयामत है कि जब वो लेते हैं अंगड़ाई,
मेरे सीने में सब जख्मों के टाँकें टूट जाते हैं।

-'अमीर' मीनाई

 

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इलाही खैर हो उलझन पै उलझन बढ़ती जाती है,
न मेरा दम न उनके गैसुओं का खम निकलता है।
कयामत ही न हो जाये जो पर्दे से निकल आओ,
तुम्हारे मुंह छुपाने में तो ये आलम गुजरता है।

-सफी लखनवी

1.इलाही - हे खुदा 2.खम - वक्रता, टेढ़ापन

3.आलम - स्थिति, दशा, हालत

 

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इशरते-सोहबते-खूबाँ ही गनीमत समझो,
न हुई 'गालिब' अगर उग्रे-तबीई न सही।

-मिजा 'गालिब'


1.इशरते-सोहबते-खूबाँ - हसीनों की सोहबत का आनन्द

2.उग्रे-तबीई - प्राकृतिक आयु

 

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इश्क का जौके-नजारा मुफ्त को बदनाम है,
हुस्न खुद बेताब है जलवा दिखाने के लिए।

-मजाज लखनवी


1.जौके-नजारा -
देखने  की  ख्वाहिश
 

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