शेर-ओ-शायरी

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माँगते  हैं  जमाने  की   खुशियाँ,

खुद तरसते हैं इक हंसी को हम।

 

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मुस्कुराहट में छिपाते हैं जो अपने गमों को,

वो अपनी हालत पै  औरों को रूला देते  हैं।

 

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मुझे दिल दिया तो तड़प भी दे,
जो हो दूसरों का शरीके-गम।
मुझे ऐसे दिल की तलब नहीं,
जो किसी के काम न आ सके।

 

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मैं वो साफ ही न कह दूँ, जो है फर्क तुझमें, मुझमें,
तेरा दर्द दर्दे - तन्हा, मेरा गम, गमे - जमाना।

- जिगर मुरादाबादी

 

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