शेर-ओ-शायरी

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यह एक दस्तूर है मेरा कि अपने कद्रदानों को,
शरीके-ऐश करता हूँ, शरीके -गम नहीं करता।
 

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रूह को चमका, खुदी को तोड़कर जीने बना,
दो ही तदबीरें हैं दुनिया में संवरने के लिए।

1.खुदी - यह भाव कि बस हमीं हम हैं, अहंकार, अभिमान, घमंड
2. तदबीर - (i) उपाय, तरकीब (ii) उपचार, इलाज

 

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लेदे के अपने पास फकत इक नजर तो है,
क्यों देखें जिन्दगी को, किसी की नजर से हम।
माना कि इस हमीं को न गुलजार कर सके,
कुछ खार कम तो कर गए गुजरे जिधर से हम।


1.गुलजार - (i) उद्यान, बाग (ii) वह स्थान जहाँ चहल-पहल और रौनक हो
 

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वह काम कर बुलन्द हो जिससे मजाके-जीस्त,
दिन जिन्दगी के गिनते नही माहो-साल में।
-'असर' लखनवी

1.मजाके-जीस्त - जीवन की रसिकता

 

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