शेर-ओ-शायरी

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'सफी' रहते हैं जानो-दिल फिदा करने पर आमादा,
मगर उस वक्त जब इन्साँ को इन्साँ देख लेते हैं।

'सफी'

 

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सीख ले फूलों से 'गाफिल' मुद्दआ-ए-जिन्दगी,
खुद महकना ही नहीं गुलशन को महकाना भी है।

-'असर' लखनवी

1. मुद्दआ -(i) मक्सद, अर्थ, मतलब, आशय, उद्देश्य (ii) तात्पर्य, खुलासा

 

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समझते थे मगर फिर भी न रखीं दुरिया हमने,
चरागों को जलाने में जला ली उंगलियाँ हमने।


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सबका दर्द वही बाँटेंगे जो दुख सहने वाले है,
      साया करने वाले बादल, सर पै धूप संभाले हैं।
     

 

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