शेर-ओ-शायरी

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खिज्रे-मंजिल से कम नहीं ऐ दोस्त,
एक हमदर्द अजनबी का खुलूस।
-रविश सिद्दकी

1.खिज्रे-मंजिल - राह दिखने वाला2. खुलूस - सच्चा प्यार

 

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खुद ही सरशारे-मये-उल्फत नहीं होना 'असर',
इससे भर-भर कर दिलों के जाम छलकाना भी है।
-'असर' लखनवी

1.सरशारे-मये-उल्फत - मोहब्बत की मदिरा से लबालब या परिपूर्ण

 

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खूने-दिल जाया न हो मुझको तो इतनी फिक्र है,
अपने काम आया तो क्या, गैरों के काम आया तो क्या?
-आनन्द नारायण 'मुल्ला'

 

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गुलों ने खारों के छेड़ने पर सिवा खामोशी के दम न मारा,
शरीफ उलझें अगर किसी से तो फिर शराफत कहाँ रहेगी।
-'शाद' अजीमाबादी
 

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