शेर-ओ-शायरी

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खुदा गवाह है दोनों है दुश्मने -परवाज,
गमे-कफस हो या राहत हो आशियाने की।

-गोपाल मित्तल


1.परवाज - उड़ान 2.कफस - पिंजड़ा

 

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गुलों के साये में अक्सर 'रियाज' तड़पा हूँ,
करार कांटों पै कुछ ऐसा पा लिया मैंने।

-'रियाज' खैराबादी

 

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गो सकूं की जुस्तजू भी उम्र भर होती रही,
दिल की दुनिया मुंतशिर ही मुंतशिर होती रही।
अहरमन की बंदगी जिक्रे खुदा के साथ –साथ,
हर जमाने में बअन्दाजे - दिगर होती रही।

-असर सहबाई

1.गो - यद्यपि, अगरचे 2.जुस्तजू - तलाश

3.मुंतशिर - (i) बिखरना, तितर-बितर, अस्त-व्यस्त
(ii) परेशान, उद्विग्न 4.अहरमन - शैतान 5.बंदगी - पूजा, इबादत
6.बअन्दाजे–दिगर - अलग अलग ढंग से

 

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चलने को चल रहा हूँ मगर इसकी खबर नहीं,
मैं हूँ सफर में या मेरी मंजिल सफर में है।

-शमीम राँचवी
 

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