शेर-ओ-शायरी

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फकत इक शगले - बेकारी है अब बादाकशी अपनी,
वो महफिल उठ गई कायम थी जिससे सरखुशी अपनी।

-गोपाल मित्तल


1.शगले – बेकारी - बेकार का काम 2. बादाकशी - शराब पीना

3. सर-खुशी - हलका नशा, हलके नशे से उत्पन्न मस्ती
 

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फरिश्तों में थी शैख साहब की गिनती,
वह रिन्दों की सुहबत में इंसां हुए हैं।

-'रियाज' खैराबादी


1.शैख - धर्मोपदेशक, सदुपदेशक 2.रिन्द - शराबी
3.सुहबत - साथ, संगति

 

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मय से गरज निशात है किस रूसियाह को,
एक गुना बेखुदी मुझे दिन रात चाहिए।

-मिर्जा 'गालिब'


1.मय - शराब 2.निशात - खुशी

3.रूसियाह - पापी, गुनाहगार 4. गुना - थोडी-सी
 

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मस्त करना है तो खुम से मुंह लगा दे साकी,
तू पिलायेगा कहां तक मुझे पैमाने से।

-'जलील' मानिकपुरी


1.खुम - घड़ा, मटका, सुराही

 

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