शेर-ओ-शायरी

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किस-किस पै जान दीजिए, किस-किस को चाहिए ,
गुम हो गया हूँ, बज्मे - तमन्ना में आके मैं।

-जिगर मुरादाबादी


 1.बज्म - महफिल

 

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खयाल तक न किया अहले-अंजुमन ने कभी,
तमाम रात जली शमअ अंजुमन के लिए।

-वहशत कलकतवी


1.अहले-अंजुमन - महफिल वालों

 

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खुदा जाने यह दुनिया जल्वागाहे-नाज है किसकी,
हजारों उठ गये लेकिन वही रौनक है महफिल की।


1.जल्वागाह- जहाँ जल्सा या समारोह हो रहा हो,
- जल्वा दिखाने का स्थान
2. नाज – नाजोअदा, मान, अभिमान,घमंड

 

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खूब इन्साफ तेरे अंजुमने-नाज में है,
शम्अ का रंग जमे खून हो परवाने का।
-'जलील' मानिकपुरी


1.अंजुमन - महफिल

 

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