शेर-ओ-शायरी

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जाता हूँ दाग-ए -हसरते - हस्ती लिये हुए,
हूँ शम्अ-ए-कुश्ता, दुरखुर-ए-महफिल नहीं रहा।

-मिर्जा 'गालिब'


1.दाग-ए-हसरते-हस्ती- जीवन की अभिलाषाओं का न पूरा होना

2. शम्अ-ए-कुश्ता- बुझी हुई शम्आ 3. दुरखुर- योग्य, लायक, काबिल।

 

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जो किस्मत में जलना ही था तो शम्अ होते,
कि पूछे तो जाते किसी अंजुमन में हम।

-सफी' लखनवी


1. अंजुमन - महफिल, बज्म।
 

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तुम्हारी बज्म में हम संभल जाते यह मुश्किल था,
तुम्ही बेताब करते थे, तुम्हीं फिर थाम लेते थे।
-'जलाल' लखनवी


1.बज्म - महफिल 2.बेताब - (i) व्याकुल, बेचैन, बेकरार

(ii) अधीर, बेसब्र (iii) मुश्ताक, उत्कंठित

 

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तूफान-ए-गम की तुन्द हवाओं के बावजूद ,
एक शमए-आरजू है जो अब तक नहीं बुझी।
'शाद' बात क्या है कि बज्में- हयात में,
शमा तो जल रही हैं मगर रौशनी नहीं।
- नरेश कुमार शाद


1.तुन्द- (i) तीव्र, प्रचंड, पुरजोर, तेज (ii) कुपित, गुस्से में

2.बज्मे-हयात- जीवन की महफिल
 

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