शेर-ओ-शायरी

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नकाबे-रूख उलटने तक तो मुझको होश था लेकिन,
भरी महफिल में उसके बाद क्या गुजरी खुदा जाने।

-सईद अहमद खां


1. नकाबे-रूख - मुखावरण ,मुखपट, पर्दा

 

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नजर में ढलके उभरते हैं दिल के अफसाने
ये और बात है कि दुनिया नजर न पहचाने
यह बज्म देखी है मेरी निगाह ने कि जहाँ
बगैर शम्अ भी जलते रहते हैं परवाने।

-सूफी तबस्सुम (सूफी गुलाम मुस्तफा)
 

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फकत इक शगले - बेकारी है अब बादाकशी अपनी,
वो महफिल उठ गई कायम थी जिससे सरखुशी अपनी।
-गोपाल मित्तल

1. शगले–बेकारी- बेकार का काम 2. बादाकशी- शराब पीना
3. सरखुशी- हलका नशा, हलके नशे से उत्पन्न मस्ती

 

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बज्म में बर्के – नजर है सद - तमन्ना आफ्रीं,
दिल में है महफिल कोई या दिल मेरा महफिल मैं है।

1.बज्म- महफिल 2. बर्के–नजर- बिजली गिराने वाली नजर
3. सद- शत, एक सौ 4. आफ्रीं- धन्यवाद, शाबाश, साधु-साधु


 

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