शेर-ओ-शायरी

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मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए,
जोशे-कदह से बज्मे-चरागाँ किये हुए।
-मिर्जा गालिब


1.कदह - शराब पीने का जाम, पान-पात्र, सागर
2.बज्मे-चरागाँ - महफिल को चरागों से रौशन करना
3.जोश- आवेग,जोर, उमंग,उत्साह


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यह बज्मे-फलक इससे होगी न सूनी,
अगर टूट जायेंगे दो चार तारे।
-'अफसर' मेरठी


1. फलक - आकाश, आसमान, अम्बर 2. बज्म - महफ़िल

 

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यह दस्तूरे-जबाबंदी है कैसी, तेरी महफिल में,
यहाँ तो बात करने को तरसती है जबाँ मेरी।
-मोहम्मद 'इकबाल'

1.जबाबंदी - बोलने की मनाही

 

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यह न जाना था कि उस महफिल में दिल रह जायेगा,
हम ये समझे थे चले आयेंगे दम भर देखकर।
-ममनून
 

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