शेर-ओ-शायरी

<< Previous   महफ़िल   Next >>

वह आये बज्म में इतना तो 'मीर' ने देखो,
उसके बाद चरागों में रौशनी न रही।
-मीरतकी 'मीर'


1.बज्म - महफिल

 

*****


वह हैं मासूम जिनसे अंजुमन का नज्म बरहम है,
हमीं पै किस लिए आता है हर इल्जाम ऐ साकी।
-'अदीब' मालीगांवी


1.अंजुमन - महफिल 2. नज्म - प्रबन्ध, व्यवस्था, इन्जाम
3.बरहम - अस्त-व्यस्त, तितर-बितर,

 

*****


वाँ वह गरूरे-इज्जो-नाज यां यह हिजाबे-पासे-वज्अ,
राह में हम मिले कहाँ, बज्म में वह बुलायें क्यों?
-मिर्जा गालिब


1. इज्ज –(i) बेबसी , कमजोरी ( ii) नम्रता, विनीति
2.नाज - (i) मान, अभिमान (ii) नाजोअदा 3.हिजाब - आड़, ओट, पर्दा
4. पास - लिहाज, संकोच, शील 5.वज्अ - शैली, ढंग 6. बज्म - महफिल

 

*****


सरे-महफिल जुबाँ खुलवाने वालों।
जरा सोचो पशीमाँ कौन होगा?


1.सरे-महफिल - भरी महफिल में 2. पशीमाँ - लज्जित, शर्मिंदा

*****

 

         << Previous  page - 1 - 2 - 3 - 4 - 5 - 6 - 7 - 8  Next >>