शेर-ओ-शायरी

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कहाँ का वस्ल तन्हाई ने शायद भेष बदला है,
तेरे दम भर को आ जाने को भी हम क्या समझते हैं।

-'फिराक' गोरखपुरी


1.वस्ल - मिलन, विसाल

 

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खुश होते हैं पर वस्ल में यूं मर नहीं जाते,
आई शबे-हिज्रां की तमन्ना मेरे आगे।

-मिर्जा गालिब


1.वस्ल - मिलन 2.शबे-हिज्रां - जुदाई की रात 

 

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जीना मरना हिज्र के बीमार का क्या चीज है,
इक तेरे आने का नाम, इक तेरे जाने का नाम।
-अजीज बीकानेरी


1.हिज्र - वियोग, विरह

 

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तुमको पाकर भी न कम हो सकी बेताबिए-दिल,
इतना आसान तेरे इश्क का गम था भी कहाँ।
-फिराक गोरखपुरी


1.बेताबिए-दिल - दिल की बेचैनी या बेकरारी

 

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