शेर-ओ-शायरी

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मैंने तो होठ सी लिये, इस दिल का क्या करूँ,
बेइख्तियार तुमको पुकारा कभी - कभी।

-असर लखनवी


1.बेइख्तियार - बेतहाशा, सहसा, मजबूर होकर असर लखनवी
 

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मैंने समझा था कि तू है तो दरख्शां है हयात,
तेरा गम है तो गमे-दहर का झगड़ा क्या है।
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है?

-फैज अहमद फैज


1.दरख्शां - रौशन, प्रकाशमान 2.हयात - जिन्दगी

3. गमे-दहर - सांसारिक गम 4.आलम - दुनिया, संसार

5.सबात - स्थायित्व, पायदारी, चिरस्थायित्व

 

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मौकूफ र्म  ही  पै  करम का  जुहूर  था,

बन्दा अगर कुसूर न करता, गुनाह था।

 

1.मौकूफ-निर्भर, आधारित 2.करम-मेहरबानी,कृपा 

3. जुहूर-(i) प्रकट, जाहिर होना (ii) उत्पति (iii) आविर्भाव, अवता

 

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मौत आई, उसे तो आना था,
आप आते तो कोई बात भी थी।

-फिराक गोरखपुरी
 

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