शेर-ओ-शायरी

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यह बात, यह तबस्सुम, यह नाज, यह निगाहें,

आखिर तुम्ही बताओ क्यों कर न तुमको चाहें।

   -जोश मलीहाबादी

 

1.तबस्सुम-मुस्कान

 

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यह बात हमने मुहब्बत की  आग  में देखी,

भड़कती जाती है जितनी बुझाई जाती है।

  -सबा जयपुरी

 

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यह भीगी रात और यह बरसात की हवाएं,
जितना भूला रहा हूँ, वह याद आ रही है।

-असर लखनवी
 

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यह महवीयत का आलम है, किसी से भी मुखातिब हूँ,
जुबाँ पर बेतहाशा आप ही का नाम आता है।

-असर लखनवी


1.महवीयत - तल्लीनता, किसी के ख्याल में खो जाना
2.बेतहाशा - बहुत अधिक

 

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