शेर-ओ-शायरी

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शाम के झुटपुटे में यूँ तेरा खयाल आया,
जैसे जबीने-चर्ख पर कोई सितारा जगमगाया।

-फिराक गोरखपुरी


1.जबीने-चर्ख - आकाश का माथा


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शायद इसी का नाम मुहब्बत है 'शेफ्ता',
है आग-सी सीने के अन्दर लगी हुई।
-शेफ्ता
 

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शायद मुझे निकालकर पछता रहे हों आप,
महफिल में इस खयाल से फिर आ गया हूँ मैं।
-अब्दुल हमीद अदम

 

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शिकवा क्या करता कि उस महफिल में कुछ ऐसे भी थे,
उम्र भर जो अपने जख्मों पै नमक छिड़का किये।


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