शेर-ओ-शायरी

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होता है राजे-इश्को-मुहब्बत इन्हीं से फाश,
आंखें जुबाँ नहीं है मगर बेजुबाँ नहीं।

-असगर गौण्डवी


1.फाश - प्रकट, व्यक्त, जाहिर

 

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होती नहीं कुबूल दुआ तर्के-इश्क की,
दिल चाहता न हो तो जुबाँ में असर कहाँ।

-ख्वाजा हाली


1.तर्के-इश्क - प्यार, मुहब्बत या साफदिली से महरूम होकर,

निःस्वार्थ प्यार से महरूम
 

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हौसले फिर बढ़ गये, टूटा हुआ दिल जुड़ गया,
उफ! यह जालिम मुस्कुरा देना, खफा होने के बाद।

-आर्जू लखनवी


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