शेर-ओ-शायरी

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इश्क मुझको नहीं वहशत ही सही,

मेरी वहशत तेरी शोहरत ही सही,
कत्अ कीजे  न तअल्लुक हमसे,

कुछ नहीं है तो अदावत ही सही।
हम भी दुश्मन तो नहीं हैं अपने

गैर से  तुमको मुहब्बत ही सही,
अपनी हस्ती ही से हो जो कुछ हो
, आगही गर नहीं,गफलत ही सही,
हम भी तस्लीम की खू डालेंगे,

बेनियाजी तेरी आदत ही सही।
-मिर्जा गालिब

1.वहशत - दीवानगी, पागलपन 2.कत्अ- परित्याग, विच्छेद, अलग होना
3. तअल्लुक - संबंध 4.अदावत -दुश्मन6.आगही - परिचय, जान-पहचान 6.गफलत - उपेक्षा, बेवफाई 7.तस्लीम - स्वीकार करना, मानना, कुबूल करना 8.खू - आदत 9.बेनियाजी - उपेक्षा, बेपर्वाई, बेतवज्जुही


*****

इश्क में ख्वाब का ख्याल किसे,
न लगी आंख जब से आंख लगी।
-मुहम्मद हयात हसरत


1.ख्वाब - (i) नींद, सोने की क्रिया (ii) स्वप्न

 

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इशरते-कतरा है दरिया में फना हो जाना,
दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना।

-मीरतकी मीर


1.इशरते-कतरा
- बूँद की खुशी 2.फना - नष्ट, बर्बाद
 

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इश्क का जौके-नजारा मुफ्त को बदनाम है,
हुस्न खुद बेताब है जलवा दिखाने के लिए।
-मजाज लखनवी
 

1.जौके-नजारा - देखने का शौक
 

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