शेर-ओ-शायरी

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इश्क की बर्बादियों को रायगां समझा था मैं,
बस्तियाँ निकली, जिन्हे वीरानियाँ समझा था मैं।
-जिगर मुरादाबादी


1.रायगां - व्यर्थ, बेकार

 

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इश्क के रूतबे के आगे आसमाँ भी पस्त है,
सर झुकाया है फरिस्तों ने बशर के सामने।

-नसीम


1.पस्त - (i) लघु, छोटा (ii) नीचा 2.बशर - मानव, आदमी

 

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इश्क खुद खानुमा-खराब सही,
मगर जिन्दगी की पनाह है प्यारे।

-रविश सिद्दकी


1.खानुमा-खराब - घर बर्बाद करने वाला, जिसका परिवार और

धन आदि नष्ट हो गया हो   2.पनाह - (i) आश्रय, सहारा, (ii) रक्षा,

हिफाजत (iii) प्राण-रक्षा, बचाव
 

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इश्क ने 'गालिब' निकम्मा कर दिया,
वरना हम भी आदमी थे काम के।

-मिर्जा गालिब

 

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