शेर-ओ-शायरी

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इस लिये चुप हूँ कि बात और न बढ़ जाये कही,
वर्ना सच ये है कि कुछ तुमसे गिला है तो सही।

-गोपाल मित्तल

 

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इसमें जब तक किसी की आस न थी,
दिल था इक फूल जिसमें बास न थी।
-
नरेश कुमार 'शाद'


1.बास - सुगन्ध, खुश्बू

 

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इससे बढ़कर नहीं कोई दौलत,
लीजिये जाँ निसार करता हूँ।


-साजन पेशावरी

 

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इसी का नाम है मजबूरी-ए-दिल, उनके कूचे में,
न जाने की कसम सौ बार खा लेना, मगर जाना।

-अनवर साबरी


1.कूचा - गली
 

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