शेर-ओ-शायरी

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कुछ तो लतीफ होती घड़ियाँ मुसीबतों की,
तुम एक दिन ही मिलते, दो दिन की जिंदगी में।
- सागर निजामी


1.लतीफ - कोमल, नाजुक, नर्म
 

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कुछ नहीं कहती निगाहें मगर,
बात पहुंची कहाँ से कहाँ तक।
-'फिराक' गोरखपुरी
 

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कुछ समझ में नहीं आता कि यह क्या है 'हसरत',
उनसे मिलकर भी न इजहारे-तमन्ना करना।

-हसरत मोहानी
 

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कुछ सहारा चाहती है आशिकी की जिन्दगी,
बेनियाजी तेरे सदके, नाजे-बेजा ही सही।

-आर्जू लखनवी


1.बेनियाजी- उपेक्षा, बेतवज्जुही 2.बेजा - अनुचित, नामुनासिब

 

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