शेर-ओ-शायरी

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चोट देकर आजमाते हो दिले- आशिक का सब्र,
काम शीशे से नहीं लेता कोई फौलाद का।

-साकिब लखनवी
 

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छूटकर तेरे आस्ताँ से ऐ दोस्त,
तू ही कह दे, कहाँ रहें हम।

-फिराक गोरखपुरी


1.आस्ताँ - चौखट, दहलीज

 

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छोड़ा न रश्क ने कि तेरे घर का नाम लूँ,
हर एक से पूछता हूँ कि जाऊँ किधर को मैं।
जाना पड़ा रकीब के दर पै हजार बार,
ऐ काश जानता न तेरी रहगुजर को मै।
-मिर्जा गालिब


1.रश्क - इर्ष्या, किसी को हानि पहुंचाये बगैर उस जैसा बनने

 की भावना 2.रकीब - किसी से प्रेम करने वाले दो व्यक्ति परस्पर

रकीब होते हैं3.रहगुजर - रास्ता, पथ
 

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छोड़ूंगा मैं न उसे बुते-काफिर को पूजना,
छोड़े न खल्क गो मुझे काफिर कहे बगैर।
'गालिब' न कर हुजूर में तू बार-बार अर्ज,
जाहिर है तेरा हाल सब उन पर कहे बगैर।
-मिर्जा गालिब


1.बुते-काफिर - बेवफा प्रेमिका 2. .खल्क - अवाम,
3. काफिर- सत्य को छुपाने वाला, ईश्वर की दी हुई नेमतों पर कृतज्ञता

 प्रकट न करने वाला। 4.हुजूर - उपस्थिति, मौजूदगी

 

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