शेर-ओ-शायरी

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निगाहे-लुत्फ  से  देखा  यही  गनीमत  है,

सलाम   उसने  हमारा  लिया    लिया।

 

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नुक्ताचीं है गमे - दिल, उसको सुनाये न बने,
क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने।
मैं बुलाता तो हूँ उसको मगर ऐ जज्बए-दिल,
उस पै बन आये कुछ ऐसी कि बिन आये न बने।

मौत की राह न देखूं कि बिन आये न रहे,
तुमको चाहूं कि न आओ तो बुलाये न बने

इश्क पर जोर नहीं, है ये वो आतिश 'गालिब',
कि लगाये न लगे और बुझाये न बने।

-मिर्जा गालिब


1.नुक्ताचीं -मीन-मेख निकालने वाला, ऐब ढूँढने वाला

2.गमे–दिल - दिल का रंज, मनस्ताप
3.जज्बए-दिल -दिल की कशिश 4.आतिश - आग

 

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परतवे-खुर से शबनम को फना की तालीम,
मैं भी हूँ इक इनायत की नजर होने तक।
-मिर्जा गालिब


1.परतव - प्रकाश, रौशनी 2.खुर - सूर्य, सूरज 3. शबनम - ओस

4.फना - नष्ट, बरबाद 5.तालीम - (i) उपदेश, नसीहत (ii) शिक्षा, पढ़ाई
 

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पहले कुछ और थे अरमान मरीजे – गम के,
अब तो बस एक ही तमन्ना है आराम न हो।
-अंदलीब शादानी


1.मरीजे – गम - विरह के दुख से संतप्त

 

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