शेर-ओ-शायरी

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अपनी हालत का खुद एहसास नहीं है हमको,
मैंने औरों से सुना है कि, परीशां हूँ मैं।

-आसी उल्दानी

 

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क्या आ गया खयाल दिले - बेकरार में,
खुद आशियाँ को आग लगा दी, बहार में।

-जिगर मुरादाबादी

 

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कौम का गम लेकर दिल का यह आलम हुआ,
याद भी आती नहीं, अपनी परीशानी मुझे।
-चकबस्त लखनवी

 

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खिजां के बाद गुलशन में बहार आई तो है लेकिन,
उड़ा जाता है क्यों अहले-चमन का रंग क्या कहिए।

-रविश सिद्दकी


1.खिजां - पतझड़ ऋतु 2.अहले-चमन - चमन वालों

 

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परीशां हाल हैं लेकिन हमें है पासे-खुद्दारी,
हमारा सर किसी के आस्तां पर खम नहीं होता।

-शंकर जौधपुरी


1.पास - शील, संकोच, लिहाज 2.आस्तां -चौखट, दहलीज

3.खम - झुकना

 

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