शेर-ओ-शायरी

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किससे महरूमिए-किस्मत की शिकायत कीजे,
हमने चाहा था कि मर जाएँ सो वो भी न हुआ।

-मिर्जा 'गालिब'


1.महरूमिए-किस्मत-दुर्भाग्य, बदकिस्मती
 

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किसी ने जैसे कसम खाई हो सताने की,
हमीं पै खत्म है सब गर्दिशें जमाने की।

सकूं तो खैर हमें नसीब क्या होगा,
कहो अभी भी हिम्मत है गम उठाने की।


1.गर्दिश-मुसीबत, बदकिस्मती, दुर्भाग्य

 

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कुछ भी कहने की मुझे उनसे जरूरत न पड़ी,
आ गया काम मेरा बेसरोसामां होना।

-आनन्द नारायण 'मुल्ला'
 

1.बेसरोसामां-बिना सामग्री या सामान के, जिन्दगी के जरूरी सामान से वंचित
 

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कैद करता मुझको लेकिन जब गुजर जाती बहार,
क्या बिगड़ जाता जरा-सी देर में सैयाद का ?

-'साकिब' लखनवी


1.सैयाद-बहेलिया, आखेटक, व्याध, चिड़ीमार

 

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