शेर-ओ-शायरी

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कोई दिन का मेहमाँ हूँ हूँ ऐ अहले-महफिल,
चिरागे - सहर हूँ, बुझा चाहता हूँ।

-मोहम्मद इकबाल


1 अहले – महफिल -महफिल वालों 2. सहर-सुबह, सबेरा, प्रातःकाल
 

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कौन है जो नहीं है हाजतमद,
किसकी हाजत रवा करे कोई।
जब तवक्को ही उठ गई 'गालिब',
क्यों किसी का गिला करे कोई।

-मिर्जा 'गालिब'


1.हाजतमद-(i) इच्छुक, अभिलाषी, ख्वाहिशमंद (ii) मोहताज

2.हाजत- इच्छा, अभिलाषा, ख्वाहिश, मनोकामना
3. रवा- पूरा करना 4. तवक्को-आशा, भरोसा, उम्मीद

 

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कौन आए मरने को वह हमारी बस्ती है,
जिन्दगी जहाँ आकर मौत को तरसती है।

-'नातिक' गुलगठवी

 

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कौन से जख्म का खुला टाँका,
आज दिल में फिर दर्द होता है।

-जिया

 

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