शेर-ओ-शायरी

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अब तो घबरा के कहते हैं मर जायेंगे,
मर के भी चैन न पाया तो किधर जायेंगे।
-अब्राहम 'जौक'

 

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अब मैं कहाँ ढूँढ़ने जाऊँ सकूँ को ऐ दोस्त,
इन जमीनों में नहीं, इन आसमानों में नहीं।
-मुईन अहसन 'जज्बी'

 

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अभी जिन्दा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ खल्वत में,
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने।
-'साहिर' लुधियानवी

1.खल्वत - एकान्त, तन्हाई, जहाँ कोई दूसरा न हो।

 

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अभी से क्यों छलक आये तुम्हारी आँख में आंसू,
अभी छेड़ी कहाँ है दास्ताने - जिन्दगी मैंने।
अरमाँ तमाम उम्र के सीने में दफ्न है,
हम चलते-फिरते लोग मजारों से कम नहीं।
-खलिश' बड़ौदवी

 

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