शेर-ओ-शायरी

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खुश्क होते नहीं है मेरे आँसू,
बारहा मुस्कराकर मैंने देख लिया।

-जमील


1.बारहा-अक्सर, बार-बार, बहुधा।

खूं हो के जिगर आंख से टपका नहीं ऐ मर्ग,
रहने दो अभी याँ कि अभी काम बहुत है।
होगा कोई ऐ कि 'गालिब' को न जाने,
शायर तो बहुत अच्छा है, बदनाम बहुत है।

-मिर्जा 'गालिब'


1.मर्ग-मौत, मत्यु, मरण

 

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गम अगर्चे जाँगुसिल है, पै कहाँ बचे कि दिल है,
गमे-इश्क गर न होता, गमे - रोजगार होता।
कहूँ किससे मैं कि क्या है, शबे-गम बुरी बला है,
मुझे क्या बुरा था मरना, अगर एक बार होता।
हुए हम जो मर के रूसवा, हुए क्यों न गर्के-दरिया,
न कभी जनाजा उठता, न कहीं मजार होता।

-मिर्जा 'गालिब'


1.जाँगुसिल-जानलेवा, प्राणघातक 2. गमे-रोजगार-संसारिक दुख, जीवन की व्यथाएँ, जीवन-कष्ट 3. शबे-गम- विरह का गम
 

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गमे -हस्ती का 'असद' किससे जुज-मर्ग इलाज,
शम्अ हर रंग में जलती है सहर होने तक।

-मिर्जा 'गालिब'


1.जुज-मर्ग- मौत के अलावा 2. सहर- सुबह, सबेरा

 

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