शेर-ओ-शायरी

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गुल भी हैं गुलिस्ताँ भी है मौजूद,
इक फकत आशियाँ नहीं मिलता।

-अर्श' मल्सियानी
 

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गुलशन में जब कोई जा-ए-अमाँ न हो,
फिर क्यों बहार अपनी नजर में खिजाँ न हो।
हम कैद से रिहा हुए भी तो क्या हुआ,
जब गोशा-ए-चमन में नसीब आशियाँ न हो।

-'असर' लखनवी


1.जा-ए-अमाँ-वह स्थान जहाँ शान्ति या सुकून मिल सके

2. खिजाँ-पतझड़ 3. गोशा-ए-चमन-बाग का एक कोना

 

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गुलिस्ताने-हयाते-चन्दरोजा का न सुन किस्सा,
बहार आयी थी बरसों में, खिजाँ आई घड़ी भर में।

-'शौकत' थानवी


1.गुलिस्ताने-हयात- जीवन बगिया 2. चन्दरोजा-थोड़े दिनों का, अस्थायी, नाशवान, फानी, नश्वर 3.खिजाँ-पतझड़
 

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गो सकूँ की जुस्तजू भी उम्र भर होती रही,
दिलकी दुनिया मुन्ताशिर ही मुन्ताशिर होती रही।

-'असर' सहबाई


1.
गो- यद्यपि,अगरचे 2.जुस्तजू-तलाश,खोज 3. मुन्ताशिर-बिखरना, अस्त-व्यस्त, तितर-बितर


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