शेर-ओ-शायरी

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जहर मिलता रहा, जहर पीते रहे,
यूं ही मरते रहे, यूं ही जीते रहे।
जिन्दगी भी हमें आजमाती रही,
और हम भी उसे आजमाते रहे।

 

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जाता हूँ दाग-ए-हसरते-ए -हस्ती  लिये हुए,
हूँ शम्अ-ए-कुश्ता, दुरखुर-ए-महफिल नहीं रहा।

-मिर्जा 'गालिब'


1.दाग-ए-हसरत-ए-हस्ती-जीवन की अभिलाषाओं का  पूरा न होना

2. शम्अ-ए-कुश्ता-बुझी हुई शम्आ 3. दुरखुर-योग्य, लायक, काबिल

 

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जाते हवाए-शौक में हैं, इस चमन से 'जौक',
अपनी बला से बादे -सबा अब कभी चले।

-अब्राहम 'जौक'

 
1.हवाए-शौक-शौक को पूरा करने की ख्वाहिश

2.बादे-सबा-सबेरे की पुर्वा हवा
 

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जिन्दगी इक आसुओं का जाम था,
पी गये कुछ और कुछ छलका गये।


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