शेर-ओ-शायरी

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जिसमें धड़का लगा रहे गम का,
क्या करूँ लेके ऐसी राहत को।

-'अख्तर' अंसारी
 

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जिसे नसीब हो रोजे - सियाह मेरा - सा,
वह शख्स दिन न कहे रात को तो क्यों कर हो।

-मिर्जा 'गालिब'


1.रोजे-सियाह- मनहूस और अशुभ दिन,बुरा दिन, जिस दिन कोई बुरी घटना हुई हो, रोजे-बद

 

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जो कली सुख गई वह तो खिलेगी न कभी,
बाग में फस्ले-बहार आए तो क्या जाए तो क्या?

-'शाद' अजीमाबादी


1.फस्ले-बहार- वसन्त ऋतु
 

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जो किस्मत में जलना ही था तो शम्अ होते,
कि पूछे तो जाते किसी अंजुमन में हम।

-सफी' लखनवी


1.अंजुमन-महफिल, बज्म

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